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देवी अहिल्याबाई होल्कर जी धर्म व न्याय की अडिग प्रहरी* स्वामी चिदानन्द सरस्वती

कमल अग्रवाल( हरिद्वार )उत्तराखंड

ऋषिकेश, 13 अगस्त। सम्पूर्ण भारत का गौरव, मालवा की पुण्यभूमि का प्रकाश, सनातन चेतना की शाश्वत ज्योति और नारी शक्ति की अद्वितीय प्रतिमूर्ति देवी अहिल्याबाई होल्कर जी की पुण्यतिथि पर आज परमार्थ निकेतन से श्रद्धासुमन अर्पित किये। वे एक उत्कृष्ट शासक, धर्म, न्याय, सेवा और राष्ट्रभक्ति का जीवंत आदर्श है, जो आज भी समाज को प्रेरित करती है।

देवी अहिल्याबाई होल्कर जी धर्म व न्याय की अडिग प्रहरी थी। उन्होंने 18वीं शताब्दी में न केवल मालवा का कुशलतापूर्वक शासन किया, बल्कि सम्पूर्ण भारत के आध्यात्मिक व सांस्कृतिक पुनर्जागरण में भी अपना अनुपम योगदान दिया। वे एक ऐसी शासिका थीं, जिनके लिए सत्ता साधन थी, साध्य नहीं। उनका शासन न्याय, करुणा और पारदर्शिता का प्रतीक था। प्रजा उनके लिए परिवार के समान थी और उनके निर्णय सदैव धर्मसम्मत व जनकल्याणकारी होते थे।

वे सेवा व पुनर्निर्माण का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने काशी, उज्जैन, सोमनाथ, द्वारका, हरिद्वार, रामेश्वरम्, गंगोत्री, बद्रीनाथ और कई तीर्थस्थलों पर मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं का निर्माण कराया। उनके द्वारा पुनर्निर्मित काशी विश्वनाथ मंदिर आज भी उनकी श्रद्धा और संकल्प का साक्षी है। गंगा, यमुना, नर्मदा सहित कई पवित्र नदियों के किनारे उन्होंने घाटों का निर्माण कर तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं सुनिश्चित कीं।

वे नारी शक्ति के रूप में एक प्रेरणा है। उन्होंने दिखाया कि नारी केवल परिवार का आधार ही नहीं, बल्कि राष्ट्र व धर्म की भी सशक्त संरक्षिका हो सकती है। उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि कठिन परिस्थितियाँ भी दृढ़ निश्चय और धर्मनिष्ठा के आगे झुक जाती हैं।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने विदेश की धरती से अहिल्याबाई होल्कर जी को श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुये कहा कि वे राष्ट्रभक्ति और सनातन मूल्यों की संरक्षिका थी। उन्होंने शासन को राजनीतिक दायित्व न मानकर राष्ट्र की सेवा का माध्यम बनाया। उनका जीवन और कार्य संस्कृति, धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए पूर्णतः समर्पित था। उन्होंने भारतीय संस्कृति की आत्मा, सनातन धर्म को न केवल संरक्षित किया बल्कि उसे जन-जन तक पहुँचाने का कार्य भी किया।

आज जब समाज भौतिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है, अहिल्याबाई का जीवन हमें स्मरण कराता है कि सच्ची प्रगति वही है जो सेवा, धर्म और नैतिकता के पथ पर चले। उनका आदर्श युवाओं के लिए यह प्रेरणा है कि नेतृत्व केवल सत्ता पाने का नहीं, बल्कि जनकल्याण करने का साधन है।

देवी अहिल्याबाई होल्कर का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि शक्ति, सेवा और संस्कार जब एक साथ चलते हैं तो इतिहास में अमर हो जाते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर हम सब यह संकल्प लें कि जीवन में धर्म, न्याय और सेवा के पथ पर चलकर भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाएँगे।

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