हमारी शक्ति, हमारा ग्रह के संकल्प के साथ स्वच्छ ऊर्जा की ओर एक सामूहिक कदम* स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी
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April 22, 2025
कमल अग्रवाल (हरिद्वार) उत्तराखंड
ऋषिकेश *आज हम 55वें विश्व पृथ्वी दिवस का उत्सव मना रहे हैं। इस वर्ष की थीम, हमारी शक्ति, हमारा ग्रह, हमें यह स्मरण कराती है कि पृथ्वी की सुरक्षा और संरक्षण में हमारी सामूहिक शक्ति कितनी महत्वपूर्ण है। यह थीम हमें स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है, जिससे हम 2030 तक स्वच्छ, हरित और समृद्ध धरा के निर्माण में सहयोग कर सके।
आज विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारतवर्ष की संस्कृति प्रकृति के प्रति आदर, प्रेम और संरक्षण की भावना से ओत-प्रोत रही है। हमारे ऋषियों-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही यह समझ लिया था कि मानव जीवन और प्रकृति का गहरा संबंध है, और यदि हम प्रकृति का सम्मान करेंगे, तभी हमारा अस्तित्व सुरक्षित रहेगा। यही भाव वेदों, उपनिषदों और स्मृतियों में बार-बार उभर कर आता है।
वेदों में प्रकृति की स्तुति की गयी है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चारों वेदों में प्रकृति के विविध अंगों जैसे अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, नदियों और वनस्पतियों को देवतुल्य माना गया है।
ऋग्वेद में वर्णित “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः” (पृथ्वी हमारी माता है और हम उसकी संतान हैं। हमारी संस्कृति में पृथ्वी के साथ रिश्ता आत्मीय और पारिवारिक रहा है।
स्वामी जी ने कहा कि विश्व पृथ्वी दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि पृथ्वी केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्ता है जिसमें पर्वत उसकी हड्डियाँ हैं, नदियाँ उसकी रूधिरवाहिकायें हैं और जंगल उसकी आत्मा। जंगल, नदियों की मां है। जंगल, अपने हरे-भरे अस्तित्व से न केवल वर्षा को आमंत्रित करते हैं, बल्कि उस वर्षा जल को संजोकर नदियों को जीवन प्रदान करते हैं। वे नमी को पकड़कर धरती की कोख में संचित करते हैं और वहीं से जीवनदायिनी जलधाराएँ फूटती हैं। जैसे मां अपने गर्भ में जीवन पालती है, वैसे ही वन, नदियों को जन्म देते हैं। यदि जंगल न हों, तो नदियाँ सूख जाएँगी और पृथ्वी बंजर हो जाएगी इसलिए, इस पृथ्वी दिवस पर हमें यह समझना होगा कि वनों की रक्षा करना, नदियों की रक्षा करना है और यही पृथ्वी की रक्षा है।
भारतीय ग्रंथों में नदियों को जीवंत देवी माना गया है। गंगा, यमुना, सरस्वती आदि को केवल जल की धारा नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति के रूप में पूजा गया। अथर्ववेद में जल को “आपः स्वस्तये” कहा गया है, जल कल्याण का स्रोत है।
भारतीय संस्कृति में वृक्षों को भी देवता का दर्जा प्राप्त है। पीपल, वट, आंवला, तुलसी जैसे वृक्षों की पूजा की जाती रही है। वनानि जीवितं जगतः अर्थात् वन इस संसार का जीवन हैं।
भारतीय दर्शन पंचमहाभूत, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को जीवन के मूल आधार मानता है। इनका संतुलन ही जीवन का संतुलन है। प्रकृति से छेड़छाड़ इन तत्वों के असंतुलन को जन्म देती है, जिससे आज की जलवायु आपदा जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
आज जब पृथ्वी प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक संकटों से जूझ रही है, तब भारतीय संस्कृति में निहित प्रकृति-सम्मान की भावना अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। यदि हम वेदों के इन आदर्शों को पुनः अपनाएँ, तो यह न केवल पर्यावरण रक्षा में सहायक होगा, बल्कि हमें एक संतुलित और सतत जीवनशैली भी प्रदान करेगा।
भारतीय संस्कृति का मूल ही प्रकृति के साथ सहअस्तित्व है। वेदों में वर्णित यह दिव्य ज्ञान आज भी मानवता को दिशा देने में सक्षम है। आवश्यकता है कि हम इस ज्ञान को केवल ग्रंथों में न रखें, बल्कि उसे अपने जीवन का अंग बनाकर इस धरती को फिर से हरित, शांत और पवित्र बनाएँ।
आज का दिन हमें पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, और सतत विकास के प्रति हमारी जिम्मेदारियों की याद दिलाता है।
स्वामी जी ने कहा कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, हरित, और सुरक्षित पृथ्वी छोड़ना हमारी जिम्मेदारी है। इसके लिए हमें पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देना बच्चों और युवाओं को पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में शिक्षित करना। सतत विकास को अपनाना, संसाधनों का सतत और जिम्मेदार उपयोग सुनिश्चित करना। सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करना, समुदायों को एकजुट होकर पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य करने के लिए प्रेरित करना अत्यंत आवश्यक है।