परमार्थ निकेतन में विश्वभर से पहुंच रहे योग साधक, गंगा आरती, हवन और सत्संग के माध्यम से जुड़ रहे सनातन संस्कृति से
www.shrimannews.in
September 30, 2026
कमल अग्रवाल ( हरिद्वार)उत्तराखंड
ऋषिकेश : परमार्थ निकेतन विश्वभर से आने वाले योग जिज्ञासुओं, साधकों और आध्यात्मिक यात्रियों के लिए एक ऐसा प्रमुख केंद्र बना हुआ है, जहाँ योग और आध्यात्मिक साधना के साथ भारतीय सनातन संस्कृति, परम्पराओं और जीवन मूल्यों को करीब से समझने का अवसर मिलता है। देश-विदेश से आने वाले साधक यहाँ योग एवं ध्यान के साथ गंगा आरती, हवन, सत्संग और विभिन्न आध्यात्मिक गतिविधियों में सहभागी होते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस पर परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भाषाएँ अलग हो सकती हैं, शब्द अलग हो सकते हैं, अभिव्यक्ति के माध्यम अलग हो सकते हैं, पर भावनाओं की भाषा एक होती है। दिल से निकली बात को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि दिल की भाषा सीधे दिलों तक पहुँचती है।
अनुवाद केवल शब्दों को एक भाषा से दूसरी भाषा में बदलना नहीं, बल्कि विचारों, संस्कृतियों और संवेदनाओं के बीच सेतु बनाना है। जब हम दूसरे की भाषा ही नहीं, उसके भाव को समझते हैं, तभी संवाद जन्म लेता है और दूरियाँ मिटती हैं।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के मार्गदर्शन और डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी के सान्निध्य में प्रतिदिन अनेक साधक भारतीय आध्यात्मिक परम्पराओं से जुड़ते हैं। गंगा आरती देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और योग साधकों के लिए एक महत्वपूर्ण अनुभव है।
आज की व्यस्त जीवनशैली में हमारे पास स्वयं के लिए समय सीमित होता जा रहा है। ऐसे में तीर्थ यात्रा व्यक्ति को अपनी दिनचर्या से कुछ समय अलग होकर आत्मचिंतन करने का अवसर देती है। तीर्थों पर आने का उद्देश्य केवल किसी स्थान का दर्शन करना नहीं, बल्कि वहाँ की परम्पराओं, संस्कृति और जीवन पद्धति को समझना भी है।
तीर्थ यात्रा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा माना जा सकता है जब व्यक्ति वहाँ से लौटने के बाद अपने जीवन में कुछ सकारात्मक परिवर्तन लाए। तीर्थ से लौटते समय केवल प्रसाद और तस्वीरें ही नहीं, बल्कि संस्कार, संकल्प और सकारात्मक अनुभव भी साथ लेकर जाये।
तीर्थ यात्रा का उद्देश्य अंततः व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने और अपने जीवन में बेहतर बदलाव लाने की प्रेरणा देना है। इसलिए तीर्थ पर जाएँ तो दर्शन के साथ अनुभव करें, सत्संग से सीखें, सेवा से जुड़ें और लौटते समय उन मूल्यों को अपने दैनिक जीवन में लेकर जाएँ। तीर्थ की सार्थकता वहीं है जहाँ यात्रा समाप्त होने के बाद भी उसका प्रभाव हमारे जीवन में बना रहे।