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धर्म संवर्धन तथा विश्व में सनातन की धर्म पताका फहराने का पावन पर्व है अन्नकूट उत्सव : महामंडलेश्वर श्याम दास महाराज

कमल अग्रवाल (हरिद्वार) उत्तराखंड

हरिद्वार  : दूधाधारी चौक स्थित श्री घनश्याम भवन आश्रम में परम पूज्य गुरुदेव श्री महंत 1008 किशन दास महाराज के पावन सानिध्य में अन्नकूट उत्सव बड़े ही धूमधाम हर्षोल्लास के साथ मनाया गया

इस अवसर पर बोलते हुए श्री महंत किशन दास जी महाराज ने कहा भगवान राम तथा भगवान कृष्ण की आराधना भक्तों को मनो वांछित फल प्रदान करती है तथा अन्नकूट उत्सव हमारी भारतीय प्राचीन संस्कृति का भाग है जो देवी देवताओं को प्रसन्न करने हेतु मनाया जाता है ताकि संपूर्ण विश्व में सुख शांति समृद्धि की स्थापना हो

इस अवसर पर बोलते हुए महामंडलेश्वर अनंत विभूषित प्रातः स्मरणीय श्री श्याम दास महाराज ने कहां अन्नकूट पर्व, देश की सुख शांति समृद्धि के लियें देवी देवताओं की उपासना करते हुए विश्व में शांति स्थापना हेतु धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कृतज्ञता, सेवा और प्रकृति के प्रति सम्मान का उत्सव है।

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्रदेव के घमंड को शांत करने के लिए ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का उपदेश दिया था। उन्होंने यह समझाया कि वर्षा और फल-फूल देने वाला असली देवता प्रकृति है — पर्वत, वन, नदियाँ और पशुधन। उसी दिन से अन्नकूट की परंपरा आरंभ हुई, जहाँ विविध प्रकार के अन्न, मिठाइयाँ और व्यंजन बनाकर भगवान को अर्पित किए जाते हैं।

अन्नकूट का अर्थ है “अन्न का पर्वत” — यानी समृद्धि, सहयोग और साझा भोजन की भावना। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन में अन्न ही आधार है, और अन्नदान सबसे बड़ा दान माना गया है। यह पर्व हमें कृतज्ञ होना सिखाता है — धरती माता, जल, वायु और उन सबके प्रति जो हमारे भोजन के स्रोत हैं।

अन्नकूट आत्मा की तृप्ति का भी प्रतीक है। जिस प्रकार हम स्वादिष्ट व्यंजनों से भगवान को प्रसन्न करते हैं, वैसे ही अपने भीतर के अहंकार, लोभ और ईर्ष्या को त्यागकर “मन रूपी थाली” को शुद्ध करना भी इस दिन का असली उद्देश्य है।

इस दिन लोग एक-दूसरे के घर जाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिससे समाज में सौहार्द, प्रेम और समानता की भावना बढ़ती है। कोई ऊँच-नीच नहीं, सब एक ही थाली के अन्न के सहभागी बनते हैं — यही इसका असली सौंदर्य है।

अन्नकूट हमें यह सिखाता है कि जीवन में जितना अन्न आवश्यक है, उतना ही आभार और संतुलन भी। यह पर्व मनुष्य को प्रकृति से जोड़ता है और यह संदेश देता है

इस अवसर पर महंत स्वामी प्रेम नारायण दास महंत गणेश दास महाराज पुजारी मनीष महाराज महंत कमलेश्वरानंद महाराज आशीष कोतवाल धर्मदास महाराज कोतवाल रामदास महाराज सहित भारी संख्या में संत महापुरुष तथा भक्तगण उपस्थित थे

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