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अखण्ड ज्योति बाहर से ज्यादा अंदर को प्रकाशित करती है : श्री शिवराज सिंह चौहान

कमल अग्रवाल (हरिद्वार)उत्तराखंड

हरिद्वार / गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की साधना के सौ वर्ष, माता भगवती देवी शर्मा की जन्मशताब्दी तथा सिद्ध अखण्ड दीप के प्राकट्य के सौ वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित शताब्दी समारोह आज भव्यता एवं गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हो गया। शताब्दी समारोह के प्रथम चरण में निकाली गई ज्योति कलश यात्रा अपनी मातृसंस्था शांतिकुंज पहुंची।

उल्लेखनीय है कि यह ज्योति कलश यात्रा भारत सहित ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका सहित 20 से अधिक देशों में निकाली गई, जिससे गायत्री परिवार के संदेश को वैश्विक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाया गया।

मातृ समर्पण समापन समारोह के मुख्य अतिथि उत्तराखंड के माननीय राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल श्री गुरमीत सिंह (सेनि) ने शताब्दी समारोह को युग-परिवर्तन का सशक्त संकेत बताते हुए कहा कि यह आयोजन नवयुग के शुभारंभ की घोषणा है। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार ने मानवता को जो मूल संदेश दिया है, हम बदलेंगे तो युग बदलेगा। वही आज ब्रह्मांडीय आदेश के रूप में सामने आ रहा है।

माननीय राज्यपाल ने शिवजी के त्रिशूल की उपमा देते हुए विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और विश्वगुरु भारत को उसके तीन स्वरूप बताया। उन्होंने 51 दिवसीय (वसुधा वंदन समारोह से लेकर समापन तक) इस यात्रा को चेतना-जागरण और नवयुग-जागरण की यात्रा कहा तथा साधकों से आग्रह किया कि वे अपनी सोच, विचार और जीवन-दृष्टि को सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय के भाव से जोड़ने का संकल्प लेकर जाएँ। राज्यपाल ने ज्योति को युग-परिवर्तन का प्रतीक बताते हुए साधकों और स्वयंसेवकों के समर्पण की सराहना की तथा गायत्री मंत्र को आत्मा और ब्रह्मांडीय चेतना के मिलन का दिव्य माध्यम बताया।

समारोह के दलनायक डॉ चिन्मय पण्ड्या जी ने इस अवसर को “सौभाग्य की त्रिवेणी” बताते हुए माननीय राज्यपाल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की तथा समस्त गायत्री साधकों का आभार प्रकट किया। दलनायक डॉ. पण्ड्या ने कहा कि आज आध्यात्मिकता को सोशल मीडिया के ‘लाइक्स’ से आँका जा रहा है, जबकि सच्ची साधना चमत्कार नहीं, परिष्कार का मार्ग है। गुरु अनेक मिल सकते हैं, पर पिता समान गुरु, वर्षों की प्रतीक्षा के बाद मिलते हैं। उन्होंने कहा कि प्रकाश के लिए आँखें खोलनी पड़ती हैं और जिसने भगवान को दिया है, वह कभी खाली हाथ नहीं रहता। अंत में उन्होंने जीवन में ग्रहणशीलता विकसित करने का आह्वान करते हुए साधना और सेवा को सार्थक बनाने का संदेश दिया।

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