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गुरु ईश्वर नहीं ईश्वर का मार्ग प्रदर्शित करने वाली दिव्य विभूति हैं और हमारे मन मस्तिष्क में ज्ञान के सृजन कर्ता है : महामंडलेश्वर संजय गिरी महाराज

कमल अग्रवाल (हरिद्वार )उत्तराखंड

जनपद हरिद्वार /  ठाकुर मनोजानंद/ हरिद्वार कांगड़ी स्थित श्री सदगुरु आश्रम में भक्तजनों के बीच ज्ञान का प्रवाह करते हुए अनंत विभूषित प्रातः स्मरणीय महामंडलेश्वर 1008 श्री संजय गिरी जी महाराज ने कहा अध्यात्म की पावन धरा पर गुरु का स्थान उस प्रकाश-पुंज के समान है, जो अज्ञान के सघन अंधकार में भटकती हुई जीवात्मा को परमात्मा के मिलन का मार्ग प्रशस्त करता है। वास्तव में, गुरु ईश्वर नहीं बल्कि ईश्वर तक पहुँचने का वह पावन माध्यम हैं, जो स्वयं उस परम सत्ता के अनन्य आराधक होते हैं। वे ज्ञान के सृजनकर्ता हैं, जो शिष्य के भीतर सुप्त पड़ी चेतना को जाग्रत कर उसे सत्य से साक्षात्कार कराते हैं। एक साधारण मनुष्य, जो संसार की मोह-माया और उलझनों में फँसा है, जब ईश्वर भक्ति की अभिलाषा लेकर आगे बढ़ता है, तो उसे एक ऐसे शिक्षक और मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है जिसने स्वयं उस मार्ग की बाधाओं को पार किया हो। महामंडलेश्वर श्री संजय गिरी महाराज ने कहा गुरु का रूप उस माली की तरह है जो हृदय रूपी उपवन से विकारों के खरपतवार निकालकर उसमें भक्ति के बीज बोता है। अक्सर यह भ्रम पाल लिया जाता है कि ईश्वर की प्राप्ति भौतिक वस्तुओं या धन-संपदा के अर्पण से संभव है, किंतु सत्य इसके सर्वथा विपरीत है। मंदिरों के चौखट पर रखे उन निर्जीव दानपात्रों से उस चैतन्य ईश्वर का कोई सरोकार नहीं है, क्योंकि जो समस्त ब्रह्मांड का स्वामी है, जो कण-कण में व्याप्त है, उसे मनुष्य के तुच्छ धन की भला क्या आवश्यकता? ईश्वर स्वर्ण के आभूषणों या ऊँचे चढ़ावों के भूखे नहीं हैं; वे तो केवल भक्त की निश्छल आस्था और अडिग श्रद्धा के अभिलाषी हैं। अध्यात्म का यह मार्ग हृदय की गहराइयों से होकर गुजरता है, जहाँ बाहरी आडंबरों का कोई मूल्य नहीं रह जाता। परमात्मा तो उस सरल और निस्वार्थ भाव से प्रसन्न हो जाते हैं, जिसमें अहंकार का लेश मात्र भी न हो। जब भक्त अपनी संपूर्ण चेतना को श्रद्धा के पुष्प बनाकर ईश्वर के चरणों में अर्पित कर देता है, तब गुरु का मार्गदर्शन और शिष्य की व्याकुलता मिलकर उस परम आनंद की अनुभूति कराते हैं जिसे मोक्ष या ईश्वर प्राप्ति कहा जाता है। अंततः, ईश्वर को पाने का अर्थ किसी वस्तु को पाना नहीं, बल्कि स्वयं को उस परम सत्ता में विलीन कर देना है, और इस महान यात्रा का सारथी केवल एक सच्चा गुरु ही हो सकता है जो हमें सिखाता है कि ईश्वर धन से नहीं, बल्कि केवल और केवल सच्चे प्रेम और करुणा से ही रीझते हैं। उन्हें किसी चढ़ावे दान की आवश्यकता नहीं ईश्वर प्रेम की अनुभूति प्राप्त करने के लिए सच्ची आस्था की आवश्यकता है क्योंकि ईश्वर तो संपूर्ण सृष्टि के स्वामी है सभी लोको के स्वामी है उन्हें इस सांसारिक धन का कोई मोह नहीं होता

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