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परमार्थ निकेतन में नानी बाई का मायरा-श्री कृष्ण भक्ति की दिव्य, पावन अनूठी कथा का शुभारम्भ

कमल अग्रवाल (हरिद्वार) उत्तराखंड

ऋषिकेश/ परमार्थ निकेतन की पावन धरती पर श्रीकृष्ण भक्ति, प्रेम और सनातन संस्कृति की अनुपम छटा बिखेरते हुए “नानी बाई का मायरा” की दिव्य, पावन और अनूठी कथा का भव्य शुभारम्भ हुआ। गंगा तट पर आयोजित इस आध्यात्मिक महायज्ञ में श्रद्धा, समर्पण और भक्ति का अद्वितीय संगम हुआ।

इस पावन कथा का रसपान संत अमृतराम जी महाराज, बड़ा रामद्वारा, सुरसागर, जोधपुर के श्रीमुख से हो रहा है। उनके ओजस्वी वचनों और मधुर प्रवचनों से नानी बाई का मायरा रूपी ज्ञान गंगा प्रवाहित हो रही है। वे नानी बाई के मायरे की कथा के माध्यम से भक्ति, त्याग, प्रेम और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का संदेश दे रहे हैं। संत अमृतराम जी महाराज ने बताया कि यह कथा भगवान श्रीकृष्ण के प्रति निस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण का जीवंत उदाहरण है।

इस दिव्य अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का पावन सान्निध्य, आशीर्वाद और प्रेरणादायक उद्बोधन भी प्राप्त हुआ। पूज्य स्वामी जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि “नानी बाई का मायरा” यह दिव्य कथा भारतीय संस्कृति की आत्मा है, जिसमें श्रद्धा, सेवा, करुणा और विश्वास के मूल्यों का समावेश है। उन्होंने कहा कि जब जीवन में भक्ति का भाव जागृत होता है, तब हर परिस्थिति ईश्वर की कृपा का माध्यम बन जाती है। सोच बदलती है तो केवल विचार नहीं बदलते, पूरा जीवन रूपांतरित हो जाता है। जब अंतर्मन में सकारात्मकता, श्रद्धा और विश्वास का दीप जलता है, तब हर अंधकार स्वतः मिटने लगता है। दृष्टि बदलती है तो वही संसार, जो कभी कठिन और निराशाजनक लगता था, अब ईश्वर की सुंदर रचना प्रतीत होने लगता है।

जीवन की हर परिस्थिति एक संदेश, एक सीख और एक अवसर बन जाती है। जब हम शिकायत छोड़कर कृतज्ञता को अपनाते हैं, तब दिशा भी बदलती है और दशा भी। यही भाव हमें भीतर से प्रकाशित कर, जीवन को शांति, प्रेम और आनंद से भर देता है। स्वामी जी ने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी जड़ों से जुड़ें, सनातन मूल्यों को अपनाएँ और जीवन को आध्यात्मिकता से समृद्ध बनाएं।

संत अमृतराम जी महाराज ने कहा कि “नानी बाई का मायरा” की कथा हमें संदेश देती है कि जब जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, तब ईश्वर स्वयं अपने भक्तों की रक्षा के लिए अवतरित होते हैं। यह कथा विश्वास दिलाती है कि सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती और भगवान अपने भक्तों के मान-सम्मान की रक्षा अवश्य करते हैं।

यह आयोजन श्रीमती गीता देवी जी एवं श्री कन्हैया लाल चांडक जी के वैवाहिक जीवन के 66 वर्ष पूर्ण होने के पावन उपलक्ष्य में आयोजित किया गया है। यह अवसर सम्पूर्ण चांडक परिवार के लिये जीवन के उस आदर्श का उत्सव है जिसमें प्रेम, समर्पण और संस्कारों की धारा निरंतर प्रवाहित हो रही है। उनके दीर्घ वैवाहिक जीवन की यह यात्रा आज समाज में सम्पूर्ण परिवार के लिये प्रेरणादायक है।

श्री संजय चांडक जी, श्री संदीप चांडक जी तथा संपूर्ण चांडक परिवार अत्यंत भावभक्ति के साथ “नानी बाई का मायरा” का श्रवण कर रहे हैं। परिवार के सदस्य परमार्थ गंगा तट पर श्रद्धा, आनंद और आत्मिक संतोष के कथा का श्रवण कर रहे है। यह दृश्य दर्शाता है कि जब परिवार एक साथ भक्ति में लीन होता है, तो वह केवल एक परिवार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक शक्ति बन जाता है।

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