परीक्षित जन्म, शुकदेव आगमन एवं भीष्म पितामह स्तुति के प्रसंग ने श्रद्धालुओं को किया भावविभोर
www.shrimannews.in
September 25, 2026
कमल अग्रवाल( हरिद्वार )उत्तराखंड

हरिद्वार : धर्मनगरी हरिद्वार के भूपतवाला स्थित श्री राम कृपा धाम आश्रम में गौ सेवार्थ एवं पितृमोक्षार्थ आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत वातावरण देखने को मिला। कथा व्यास साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी जी के मुखारविंद से भक्तजनों ने श्रीमद्भागवत के विभिन्न दिव्य प्रसंगों का श्रवण किया। कथा के दौरान आश्रम परिसर में भक्ति गीतों, जयघोष और भगवान श्रीकृष्ण के नामस्मरण से आध्यात्मिक वातावरण बना रहा।

कथा के दूसरे दिन राजा परीक्षित के जन्म, शुकदेव जी के आगमन तथा भीष्म पितामह की स्तुति का भावपूर्ण वर्णन किया गया। साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी जी ने बताया कि राजा परीक्षित का जन्म भगवान की विशेष कृपा का परिणाम था। महाभारत युद्ध के पश्चात जब अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे बालक को ब्रह्मास्त्र से नष्ट करने का प्रयास किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य स्वरूप से गर्भस्थ बालक की रक्षा की। यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित कहलाया।
कथा व्यास ने राजा परीक्षित के जीवन प्रसंग के माध्यम से बताया कि मनुष्य को जीवन की अनिश्चितता और मृत्यु की वास्तविकता को समझते हुए अपने जीवन को भगवान की भक्ति, सत्संग और सद्कर्मों में लगाना चाहिए। जब राजा परीक्षित को अपने जीवन के अंतिम सात दिनों का ज्ञान हुआ, तब उन्होंने सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर गंगा तट पर श्रीहरि की कथा सुनने का संकल्प लिया।
इसी प्रसंग में श्री शुकदेव जी के आगमन का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया गया। साध्वी जी ने बताया कि शुकदेव जी जैसे महान संत का जीवन त्याग, वैराग्य और ब्रह्मज्ञान का प्रतीक है। राजा परीक्षित ने उनसे यह जानना चाहा कि मृत्यु के निकट पहुंच चुके मनुष्य को क्या करना चाहिए और भगवान की प्राप्ति का मार्ग क्या है। इसके उत्तर में शुकदेव जी ने उन्हें श्रीमद्भागवत महापुराण का दिव्य ज्ञान प्रदान किया। कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को संदेश दिया गया कि विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य को भगवान का स्मरण और सत्संग नहीं छोड़ना चाहिए।
इसके साथ ही भीष्म पितामह की स्तुति का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी जी ने बताया कि महाभारत युद्ध के बाद बाणों की शय्या पर स्थित भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुए उनकी स्तुति की। उन्होंने अपने अंतिम समय में भगवान का स्मरण किया और उनकी महिमा का गुणगान किया। यह प्रसंग मनुष्य को सिखाता है कि जीवन की अंतिम अवस्था तक भगवान के प्रति श्रद्धा और समर्पण बनाए रखना ही सच्ची भक्ति है।
कथा व्यास ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा प्रदान करने वाला आध्यात्मिक मार्गदर्शक है। भागवत कथा के श्रवण से मनुष्य के भीतर भक्ति, वैराग्य और सद्विचारों का संचार होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कथा के संदेश को केवल सुनने तक सीमित न रखते हुए उसे अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से कथा का श्रवण किया। अंत में भगवान की आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ। आश्रम परिसर में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे लगाए और धर्म, सेवा, गौसेवा तथा पितृमोक्ष के उद्देश्य से आयोजित इस धार्मिक आयोजन में सहभागिता की।