श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथा व्यास साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी जी ने भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं, कंस वध, उद्धव-गोपियों के प्रेम संवाद तथा भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी विवाह का भावपूर्ण किया वर्णन
www.shrimannews.in
September 29, 2026
कमल अग्रवाल( हरिद्वार )उत्तराखंड

हरिद्वार : श्री राम कृपा धाम आश्रम में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथा व्यास साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी जी ने भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं, कंस वध, उद्धव-गोपियों के प्रेम संवाद तथा भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी विवाह का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भक्ति और आनंद में डूब गए।
साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी जी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं के माध्यम से गोपियों को ब्रह्म तत्व की अनुभूति कराई। जीवात्मा और परमात्मा के मिलन में बाधक समस्त भौतिक एवं सांसारिक बंधनों का अंत कर भगवान ने गोपियों को परम ब्रह्म सुख की अनुभूति कराई। उन्होंने कहा कि गोपियों का प्रेम निष्काम और पूर्ण समर्पण का प्रतीक है, जिसमें किसी प्रकार की सांसारिक अपेक्षा नहीं थी।
कथा में मथुरा गमन और कंस वध का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा पहुंचकर अत्याचारी कंस का अंत किया और प्रजा को भय एवं अत्याचार से मुक्ति दिलाई। उन्होंने कहा कि प्रजा के सुख और धर्म की स्थापना के लिए अत्याचार एवं अन्याय का अंत आवश्यक था। भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा और लोककल्याण के लिए अपना दिव्य स्वरूप प्रकट किया।
इसके बाद उद्धव जी के वृंदावन आगमन का प्रसंग सुनाते हुए कथा व्यास ने कहा कि उद्धव महान ज्ञानी थे, लेकिन उनके ज्ञान में भक्ति का भाव पूर्ण रूप से समाहित नहीं था। जब वे यशोदा मैया से मिले तो उन्हें वात्सल्य प्रेम की ऐसी अनुभूति हुई, जिससे उनके ज्ञान का अभिमान धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। वहीं जब उद्धव जी गोपियों और श्री राधारानी के संपर्क में आए तो वे उनके अनन्य प्रेम और समर्पण से अभिभूत हो गए।
उन्होंने बताया कि गोपियों की कृष्ण भक्ति देखकर उद्धव जी का ज्ञानाभिमान पूरी तरह समाप्त हो गया। उन्होंने गोपियों के चरणों की धूल को अपने मस्तक पर धारण करने की भावना व्यक्त की और समझा कि भगवान को पाने के लिए केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि निष्काम प्रेम और पूर्ण समर्पण भी आवश्यक है।
कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के द्वारकाधीश बनने तथा रुक्मिणी विवाह का सुंदर प्रसंग प्रस्तुत किया गया। भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी के विवाह का वर्णन होते ही कथा स्थल जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के स्वरूप का पूजन किया। आश्रम परिसर में विवाह प्रसंग के दौरान भक्ति और उत्सव का वातावरण बना रहा।
कथा व्यास ने कहा कि श्रीमद्भागवत हमें ज्ञान, भक्ति और प्रेम के समन्वय का संदेश देती है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं मनुष्य को अहंकार त्यागकर प्रेम, सेवा, समर्पण और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। कथा के अंत में श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे लगाए और प्रसाद ग्रहण किया।